परम पूज्य प्रशममूर्ति,योगीसम्राट, तपोनिधि,दिगम्बर जैनाचार्य 108 श्री शांतिसागर जी महाराज छाणी(उत्तर) परम्परा के षष्ठपट्टाचार्य,राष्ट्रसंत,सरकोद्धारकआचार्य श्री 108 ज्ञानसागर जी महाराज ने आलोचना का वर्णन करते हुए कहा आलोचना हमारे धर्मग्रन्थों में बड़ा महत्वपूर्ण शब्द का प्रयोग हुआ है,अलौकिक क्षेत्र में आलोचना अच्छी नही मानी जाती है लेकिन अध्यात्म के क्षेत्र में आलोचना का बहुत अच्छा महत्व है , आप सब को सुनने के बाद बड़ा विचित्र से लग रहा होगा कि संत जी आप आलोचना को अच्छा बता रगे हैं। लेकिन मेरी बात को समझने का प्रयास कीजिये आप। दूसरों की आलोचना करना तो खतरनाक है,वह अशांति का कारण है........
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